भारत में बच्चे खबर नहीं बनते.. बच्चों की छिटपुट खबरें आती हैं, यौन हिंसा या दुष्कर्म का शिकार होने पर। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार हर आठ मिनट में एक बच्चा गायब हो रहा है। आखिर ये कौन-सा जाल है जहां फंस रहा है मासूम जीवन ?

सन् 2011 में भारत में 90 हजार बच्चे गायब हुए। इनमें आधे से ज्यादा केस आज भी अनसुलझे हैं। सिर्फ 15 हजार मामलों में खोजबीन हुई। भूकंप, बाढ़, सुनामी आदि प्राकृतिक विपदाओं के बाद बेघर हुए बच्चों पर भी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय

बाल माफियाओं की गिद्ध दृष्टि बनी रहती है! यूएस के स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग के अनुसार 6 से 8 लाख लोग सालाना दुनिया भर में मानव व्यापार में धकेले जाते हैं, जिनमें से 14500-17500 पीड़ित अकेले यूएस में भेजे जाते हैं।

दुनियाभर के इन पीड़ितों में आधे से ज्यादा बच्चे हैं! फीनिक्स आज के समय में बच्चों की किडनैपिंग राजधानी है। विशेषज्ञों का मानना है कि किडनैप किए गए ये बच्चे पूरी दुनिया में ‘सेक्स टॉय’ के नाम पर भेजे जाते हैं! पूरी दुनिया में तकरीबन

20 लाख बच्चे यौन गुलामी करने को मजबूर हैं। जाहिर है उनमें भारतीय बच्चे भी हैं। कुछ समय पहले ‘एकपैट इटालिया’ नाम की समाचार एजेंसी ने खुलासा किया है कि दुनियाभर में हर दो मिनट में एक बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है।

अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि बाल वेश्यावृत्ति, बाल यौन पर्यटन, बाल अश्लीलता और यौन शोषण के लिए बच्चों की तस्करी अब पुरानी बातें हो चुकी हैं। इन दिनों गरीब विकासशील राष्ट्र, यहां तक कि

इटली जैसे संपन्न राष्ट्र ‘सेक्स टॉय’ के रूप में बच्चों की तस्करी के लिए उपयुक्त बाजार बन रहे हैं। इसी एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार हर साल हजारों पर्यटक बच्चों के साथ यौन संबंध बनाने के लिए विदेश यात्रा करते हैं! भारत में इस तरह का

कोई अध्ययन न होने के कारण यह साबित नहीं होता कि हम दूध के धुले हैं।
भारत बाल वेश्यावृत्ति के लिए एक स्रोत भी है और गंतव्य भी। एक अनुमान के मुताबिक हर साल 12 से 50 हजार स्त्रियां

और बच्चे नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से वेश्यावृत्ति के लिए भारत लाए जाते हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार वेश्यावृत्ति के व्यापार में 40 प्रतिशत बच्चे हैं। छोटी लड़कियों की मांग बढ़ रही है, छोटे लड़के भी

इससे अछूते नहीं हैं। भारत में जो पर्यटन उद्योग फल-फूल रहा है उसके पीछे बाल वेश्यावृत्ति भी एक प्रमुख कारण है। न सिर्फ भारत में, बल्कि पूरी दुनिया के बच्चे भयानक यौन शोषण के शिकार हो रहे हैं।असल में पूरी दुनिया में जो यौन

उन्माद बढ़ा है उसने न सिर्फ स्त्रियों को ‘यौन वस्तु’ में तब्दील किया है, बल्कि बच्चों को भी ‘सेक्स टॉय‘ के रूप में देखने/भोगने के घिनौने चलन को बढ़ाया है। कुछ चीजें ऐसी भी हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बच्चों को स्वयं ही सेक्स उद्योग के

लिए खुद को तैयार करने के लिए उकसा रही हैं। छोटे बच्चों के लिए होने वाली ‘सौंदर्य प्रतियोगिताएं’ बच्चों, खासतौर से लड़कियों को ‘सेक्सुअलाइज’ करती हैं। बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी प्रतियोगिताएं लड़कियों के दिमाग में

बैठा देती हैं कि सुंदर दिखना ही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य है। चेहरे पर मेकअप की मोटी परत और चेहरे पर युवा होने जैसे भाव, ये सारी चीजें उनके दिमाग पर अनावश्यक दबाव बनाती हैं। बच्चे स्वेच्छा से अपनी मासूमियत और

बचपना खोकर समय से पहले युवा दिखना और महसूस करना चाहते हैं। स्वयं मां-बाप बच्चों को इन चीजों के लिए तैयार करते हैं। अपनी दबी हुई या अधूरी इच्छाओं को वे बच्चों पर लादते हैं। फैशन शो या सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भाग लेना

बच्चों के लिए वैसा ही खतरनाक है जैसे छोटी उम्र में मां बनना!
घरों के भीतर होने वाले यौन शोषण को मां-बाप काफी हद तक अपने स्तर पर रोक सकते हैं। बच्चों का ज्यादा ध्यान

रखकर, उनकी बातों पर यकीन करके, उन्हें ऐसी घटनाओं की जानकारी देकर, चौकन्ना रहने की सीख देकर। लेकिन बड़े पैमाने पर हो रहे बाल यौन अपराधों को सरकार और पूरी व्यवस्था की ईमानदारी के बिना रोकना असंभव है। हालांकि

बच्चों की यौन हमलों से सुरक्षा संबंधी एक बिल 2012 में पास किया गया है, लेकिन आशंका यही है कि इस बिल का भी वही हश्र होगा जो कि बाकी कानूनों का हो रहा है। कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बाल यौन शोषण के

मामले में चुप्पी एक जुर्म है। यदि बच्चों के यौन शोषण की जानकारी होने पर भी पुलिस को सूचित नहीं किया जाता, तो यह एक गंभीर अपराध है। इस संबंध में केंद्र व राज्य सरकारों को स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट की स्थापना के आदेश

दिए गए हैं ताकि पीड़ित बच्चों की सुरक्षा और संबंधित कार्रवाई जल्दी हो सके।
निराश करने वाला सच यह है कि निकट भविष्य में बाल यौन शोषण के और ज्यादा बढ़ने की संभावना है। अभी तक तो

इस खौफनाक सच को खुलकर स्वीकार करने में ही सांस फूल रही है। फिर ऐसे में मर्ज की दवा भला कैसे हो सकती है? बस अपने बच्चों का हाथ कसकर पकड़े रहिए, उनको चौकन्ना रखिए और उन पर विश्वास कीजिए। सावधान रहिए शिकारी

हर तरफ घात लगाए बैठे हैं। इंसान अपने बच्चे के लिए बहुत कुछ खरीद सकता है, पर बचपन नहीं खरीद सकता। किसी भी कीमत पर नहीं। जितना स्वस्थ बचपन होगा भावी समाज की नींव उतनी ही मजबूत होगी।