रघुवंश प्रसाद सिंह को बिहार की राजनीति में कर्पूरी ठाकुर के जमाने से ही बड़ी पहचान मिल चुकी थी। लेकिन, 90 के दशक से उन्होंने अगड़ी जाति (राजपूत) का नेता होकर भी पिछड़ी जाति की राजनीति की और 32 वर्षों तक लालू जैसे नेता के पीछे हर परिस्थियों में चट्टान बनकर खड़े रहे।

लेकिन, उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में तब बड़ी पहचान मिली जब 2005 में वह यूपीए-1 में मनमोहन सिंह सरकार की सबसे बहुप्रचारित कल्याणकारी योजना नेशनल रूरल एम्पलॉयमेंट गारंटी स्कीम (मनरेगा) के मुख्य वास्तुकार बने। यूपीए-1 में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रहते हुए उनके मंत्रालय से जो यह योजना लागू हुई,

उसके लिए कांग्रेस और यूपीए के दल आजतक खुद को दाद देते नहीं थकते। इस बात में कोई दो राय नहीं कि इस योजना ने देश के सोशल सेक्टर के लिए सोचने का सरकार का नजरिया बदल दिया है। यही नहीं, विकलांगों, विधवा और बुजुर्गों के लिए पेंशन योजना लागू करवाने में भी इनकी अहम भूमिका रही है

इसके अलावा इन्हीं कार्यकाल में भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसे यूपीए के दूसरे कार्यकाल में मूर्त रूप दिया गया।रघुवंश बाबू 32 साल से राजनीति में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के साथ उनकी परछाई की तरह जुड़े रहे। उन्होंने उस दौरान भी लालू का साथ नहीं छोड़ा,